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दो पल के लिए खुद को हमारी जगह रखकर “हमे महसूस कीजिए”: एक मुस्लमान

हमें महसूस कीजिए

हमें महसूस कीजिए अपने आस-पास। हमें महसूस कीजिए हर उस जगह जहाँ हम आपके साथ कदमताल करते नज़र आते हैं। हमे महसूस कीजिए हर उस जगह जहाँ हम आपके साथ काँधे से काँधा मिलाकर खड़े नज़र आते हैं। हमें महसूस कीजिए हर उस जगह जब आप हमारी और हम आपकी जरूरतों के समय आपके साथ नज़र आते हैं। हमें महसूस कीजिए सुबह के उजालों में। हमें महसूस कीजिए शाम की हवाओं में। हमें महसूस कीजिए महकती फिज़ाओं में।

Motor Mechanic

गली का छोटू भी हम ही हैं

हमें महसूस कीजिए दिन की कड़ी दोपहरी में जब हम मैकेनिक बनकर आपकी कार के नीचे लेटे हुए होते हैं ताकि आपका रुका हुआ सफर पूरा हो सके। हमें महसूस कीजिए रात के अंधेरों मे जब हम टैक्सी ड्राइवर बनकर आपके तन्हा सफ़र के हमसफ़र बन जाया करते हैं। हमें महसूस कीजिए मेहनत मजदूरी करते उन लम्हों में जब हम आपके सपनों की इमारत को अपने खून पसीनों से सींचते हुए उसे मजबूती और खूबसूरती की इंतिहा तक संवारते हैं। हमें महसूस कीजिए काॅलेज के उस कैंपस में जहाँ हम और आप महीनों पहले से एक दूसरे से होली और दीवाली, रमज़ान और ईद की तारीख़े पूछना शुरू कर देते हैं।

Lucknow food

हमारे जायके को कैसे भूल सकते है आप.

हमें महसूस कीजिए अपने ऑफिस के कैंटीन में जहाँ हम और आप एक दूसरे का हाल चाल लिया करते हैं सुख-दुःख बांटा करते हैं। हमें महसूस कीजिए दिल्ली, हैदराबाद, भोपाल, लखनऊ की उन गलियों में जब हम आपको लाजवाब स्वाद का और बेमिसाल खुश्बू से रू-ब-रू कराते हैं। हमें महसूस कीजिए रूह को ठंडक पहुँचाती रूह-अफ़ज़ा की ताज़गी में।

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हमें महसूस कीजिए आपके तन बदन को महकाती मदहोश करती इत्र की खुश्बुओं में।हमें महसूस कीजिए इलाहाबाद और लखनऊ जैसे उत्तर प्रदेश की उन शहरों गाँवों और कस्बों में (जहाँ नई सरकार आते ही हम कशमकश के दौर से गुजर रहे हैं) हमें महसूस कीजिए उन घनी बस्तियों में जिसकी बदौलत आप लखनऊ के टुंडे कबाबी जैसी दुकानों में सालों से गलावटी कबाब का लुत्फ़ उठाते आए हैं। 

Hum ek hai

हम एक हैं|

हमें महसूस कीजिए उन तंग हालातों में जहाँ हम बूचड़खानों में दिन रात जूझते हुए अपने बच्चों के सुनहरे भविष्य का ख्वाब बुनते थे। हमें महसूस कीजिए उन छोटी छोटी बिरयानी और कबाब की दुकानों पर जहाँ हमने McDonald’s और Domino’s को कड़ी टक्कर देते हुए मध्यमवर्गीय एवँ निम्नवर्गीय लोगों को स्वादिष्ट जायकेदार और लजीज खाना परोसा है। हमें महसूस कीजिए गंगा के उन घाटों पर जहाँ से हमने गंगा जमुनी तहज़ीब की खुश्बू पूरे मुल्क़ में बिखेरी है। हमें महसूस कीजिए बनारस के उन घाटों पर जहाँ से हमने अपनी शहनाई का जादू पूरी दुनियाँ को दिखाया। हमे महसूस कीजिए राष्ट्रपति भवन के उन बागों में जहाँ हमने मुल्क़ को अंतरिक्ष सी ऊंचाई के सपने और मिसाइल की तरह लक्ष्य साधने का विज़न दिया।

कलाम सर

कलाम सर

देश की आज़ादी से पहले और देश की आज़ादी के बाद भी हमने इस मिट्टी को अपने खून पसीने से सींचा है। हम मोहब्बत करते हैं अपने वतन से क्योंकि हमारे पूरखों को हमने ऐसा ही करते देखा और सुना है। और हमें यही तालीम दी गई है बचपन से लेकर आजतक। हमारी माँ ने हमें जो पहला तराना गाकर सुनाया था वो इक़बाल का “सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा” था। हम जब स्कूल गए तब भी हमने पूरी शिद्दत से यही तराना गुनगुनाया। हमने जब स्कूल की किताब का पहला पन्ना पलटाया तब हमे सबसे पहले जन-गण-मन गीत देखा और पढ़ा। हमने अपने मुल्क को संजाने संवारने और बनाने में हमेशा बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। हमें गंगा जमुनी तहज़ीब विरासत में मिली है जिसे हम तब से लेकर अब तक पूरी शान से जीते ही चले जा रहे हैं। हम कोई पराए नहीं हैं। हम अपने हैं आपके। हमारा दर्द समझिये। हमारे जज़्बात समझिये। हमें अपना समझिये। हमें महसूस कीजिए।

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By Islahuddin Ansari

फ़ोटो साभार: रायटर्स, इंडियाटाइम्स

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