धर्म का ज्ञान – न कोई छोटा न कोई बड़ा

एक समय की बात है, राजा वीरबाहु ने राजमहल में सभी धर्मो के धर्मगुरूओ की एक सभा बुलाई और कहा, “ हे आदरणीय ज्ञानी पुरुषो! आज मैंने आप सभी को किसी जिज्ञासावश यहाँ बुलाया है | कृपया मेरे संशय को दूर करे | मैंने सभी धर्मो की पुस्तके का बड़ा अध्यन किया है और अब चाहता हु कि सबसे अधिक उत्तम अर्थार्त सर्वश्रेष्ठ धर्म को मई धारण करूँ | अब आप लोग ही बताए कि सर्वश्रेष्ठ धर्म कौन स है ?

राजा की बात सुनकर सभी धर्मगुरु अपने-अपने धर्म की बढ़-चढ़कर प्रशंसा करने लगे | कुछ ने तो दुसरे धर्मो में खोट निकालना भी शुरू कर दिया | इस तरह उन्हें वाद-विवाद करते हुए एक सप्ताह गुजर गया, परन्तु कोई निष्कर्ष न निकला |

धीरे-धीरे वाद-विवाद की बात प्रजा तक भी पहुच गई | इसे सुनकर एक बूढ़े व्यक्ति

की आखें चमकने लगी | वह उसी समय अपनी फटी धोती पहनकर, लाठी के सहारे धीरे-धीरे चलता हुआ राजमहल के द्वार तक जा पंहुचा | सेवको ने उसे अन्दर ना जाने दिया | हारकर वह द्वार पर ही बैठ गया | सुबह के समय जब राजा बहार निकले तो उस वृद्ध को वहा देखकर द्वारपाल से उसके विषय में बारे में पूछताछ करने लगे | द्वारपाल ने राजा से कहा-“ महाराज ! यह वृद्ध आपसे धर्मं के विषय में कुछ कहना चाहते है | इनका कहना है की ये सिद्ध कर सकते है कौन-सा धर्म सर्वश्रेष्ठ है |”

ऐसा सुनकर राजा ने वृद्ध को आदर के साथ अन्दर ले जाने को कहा और उस वृद्ध को आदेश दिया की कुछ समय महल में विश्राम करके, वे धर्मसभा में उपस्थित हो | राजा की आज्ञा का पालन किया गया |

सभा ओ सम्बोधित करते हुए राजा ने कहा, “ पिछले कई दिनों से, मई आपकी दलीले सुन रहा हु | ये सज्जन आज उपस्थित हुए है और बड़े दृढ़-संकल्प के साथ कह रहे है इ इनका धर्म सर्वश्रेष्ठ है | अब मई सर्वप्रथम इनके विचार सुनाने को उत्सुक हूँ|”

वृद्ध व्यक्ति ने कहा, “ राजन ! सभागार में बैठकर, मई अपने धर्म के विषय में, आपको नहीं बता पाउँगा | इसके लिए आपको कल सुबह नदी के किनारे आना होगा | यह सुनकर सभा में बेचैनी और उत्सुकता बढ़ गई | सभी कहने, “ हम भी तो जानना चाहते है की आखिर आप किस धर्म की बात कर रहे है और कैसे आपका धर्म सर्वोपरि है ?

वृद्ध ने बड़े मधुर सब्दो में कहा, “ प्रिय बंधुओ ! यदि ऐसा है तो राजा के साथ आप भी सदर आमंत्रित है |“ ऐसा कहकर वह व्यक्ति वहा से चला गया |

सभी रातभर बेचैन रहे और उष वृद्ध के विषय में ही सोचते रहे | सुबह होते ही सभी ज्ञानी, राजा के पीछे-पीछे नदी के किनारे जा पहुचे | वृद्ध वहा पहले ही उपस्थित था | उसने राजा को अभिवादन करते हुए कहा, “ राजन ! मई आपको धर्म के विषय में, नदी के उस पार जाकर ही बताऊंगा | कृपया एक नाव मंगाए |

वृद्ध की बात सुनकर पहले तो राह को क्रोध आया परन्तु उस पर काबू पाते हुए सोचने लगे, “ अब यहाँ तक तो मई आ ही पंहुचा हु और थोड़ी देर में नदी के उस पार भी पहुच जाऊंगा |

फिर भी इस व्यक्ति ने ऐसे ही आना-कानी की, तो मै इसे समय बर्बाद करने की गंभीर सजा दूंगा |”ऐसा सोचते हुए राजा ने कहा, “ व्रिध्हा महाशय ! मई नाव का प्रबंध करवाता हु, लेकिन याद रखना, इस बार यदि आप मुझे संतुष्ट न कर पाए, तो आपको कड़ी सजा दी जाएगी | वृद्ध ने कहा, “ महाराज जैसी आपकी आज्ञा |” तब राजा ने सैनको को नाव लाने का आदेश दिया |

सैनिको ने तुरन्त राजा के सामने नाव पेश की | नाव को गौर से देखते हुए वृद्ध ने कहा, “ महाराज छमा कीजिए | इस नाव के सहारे हम दोनों उस पार नहीं जा सकते |” ऐसा सुनकर राजा ने दूसरी नाव लाने की आज्ञा दी | देखते ही देखते छोटी-बड़ी, नई-पुराणी कई नाव किनारे पर आ लगी |

लेकिन यह क्या? वृद्ध ने तो इनमे से कसीस में भी बैठने से इनकार कर दिया | राजा को गुस्सा आने लगा | वे बोले,” महात्मन ! आश्चर्य है, आपने इन सभी नावों को बेकार ठहरा दिया | मेरोसमझ में तो इनमे से जिस नाव पर आप सवार हो जायेंगे, वही आप को उस पार पंहुचा देगी |” वहा उपस्थित सभी धर्म उपदेशको ने भी राजा के स्वर में स्वर मिलाया |

वृद्ध बोला, “ क्या आप सभी सचमुच ऐसा समझाते है? “ जब सभी का उत्तर केवल हां में ही प्राप्त हुआ , तब वृद्ध मुस्कुराते हुए बोले, “ हे राजन ! जिस तरह ये सभी नावे आप को आपके गंतव्य तक पंहुचा सकती है, ठीक उसी प्रकार हर धर्म आपको अपने लक्ष्य तक पंहुचा सकता है | जैसे ये नावे एक जैसी है, वैसे ही सभी धर्म एक जैसी ही है |”

वृद्ध ने कहा,” सभी धर्मो का उद्धेश्य एक ही है| फर्क है, तो केवल सोच का |” रास्ते भिन्न-भिन्न होने से क्या होता है महाराज? पहुचते तो सभी एक ही स्थान पर है |  सभी धर्म एक ही बात कहते है, “  सच बोलो, दया और इमानदारी का आचरण करो, परोपकार के लिए त्याग करो और मनुष्य बनो |”  हे राजन ! आप किसी भी धर्म को अपनाइये, सभी सामान है, न कोई छोटा, न कोई बड़ा |” वृद्ध ने सिर उठाकर जब सभी की तरफ दृष्टी घुमाई, तो देखा की सभी लोग सिर झुकाए खड़े है | राजा तुरत आगे बढ़ा और छमा याचना मांगने लगा |

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Dharm ka gyaan - Na koi chota na koi bada
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एक समय की बात है, राजा वीरबाहु ने राजमहल में सभी धर्मो के धर्मगुरूओ की एक सभा बुलाई और कहा, “ हे आदरणीय ज्ञानी पुरुषो! आज मैंने आप सभी को किसी जिज्ञासावश यहाँ बुलाया है
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