1962 का सिपाही राजनाथ सिंह के द्वार खड़े, खाने को भी नसीब नहीं

कुसूरवार इंसान नहीं कुसूरवार होते हैं इंसान के हालात…!!!!

जिसके चलते जिंदगी जहन्नुम बनते देरी नहीं लगती | क्या किसी ने देखा या जाना की कब किसकी जिन्दगी अच्छी खासी गुजर-बसर कर  वक़्त के पहियों के साथ-साथ एक ऐसी कमजोर कड़ी में न जाने कब तब्दील हो जाती है की इंसान के अच्छे-भले दिन गुजर कर तकदीर के ऐसे पन्नो में पलट जाते हैं जिसमें हालात बद से बद्तर हो जाते हैं, यहाँ तक की कभी-कभी तो हालात इतने बुरे हो जाते हैं की रोटियों के लाले पड़ जाते हैं | इंसान की कमजोरी का फायदा उठाया जाता है | ऐसे में जब बेचारा कोई उम्मीद लगाये बैठा हो एक आश लिए की आखिर सरकार तो उसकी मदत करेगी ही | और फिर ऐसे में एक बुजुर्ग व्यक्ति और कर भी क्या सकता है सिवाय उम्मीद की | बढ़ती उम्र के साथ-साथ उसका भाग-दौड़ करना ही बहुत मुश्किल है | फिर भी वो अपनी ताकत भर ज़ोर लगाता है | अपना पेट पालने के लिए मरते दम तक अपनी आखिरी कोशिश करता रहता है, ताकि उसकी जरुरतें पूरी हो सकें |

बस इसी तरह की एक छोटी सी जरूरत लिए 86 साल के एक बुजुर्ग हीरालाल जी.., जो बिहार के बक्सर जिले के रहने वाले एक आम इंसान हैं | जो दिल्ली अपनी एक छोटी सी फ़रियाद लेकर आये हैं | दिल्ली में गृह मंत्री श्री राजनाथ सिंह के दरवाजे पर एक अर्जी लिए बैठें हैं, की उनका बस एक छोटा सा काम है की उनका राशनकार्ड और पेंशन कार्ड बनवा दिया जाये | कई जगह दरख्वास्त लगायी पर कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई तब बड़ी उम्मीद लेकर हीरालाल जी.. बस ये एक छोटी सी गुहार लिए बक्सर से चल कर दिल्ली आएँ हैं | यहाँ आने के बाद उन्हें एहसास हुआ के उनकी सारी उम्मीदें जैसे धूमिल पड़ गयीं | उन्हें दरवाजे पर से ही लौटा दिया गया स्टाफ ने उन्हें सीधा बाहर कर दिया गया | उनकी आँखें आँसूओं से भर गयीं | नाउम्मीद हुए हीरालाल अपनी कहानी व्यक्त करते हैं |

हीरालाल जी… बक्सर जिले के पन्तमेवदा गाँव के रहने वाले हैं | उन्होंने अपने बारे में बताते हुए कहा कि…सन 1962 में जब भारत और चीन में युद्ध हुआ था | उस युद्ध में भारी तादात में हमारी सेना के जवान घायल हुए थे | उनकी जान बचाने के लिए खून की जरुरत पड़ी थी | जिसकी अपील सरकार ने अपने भारतवासियों से की थी | सरकार की इस अपील को पूरा करने के लिए जो लोग आगे आये उन लोगों में से एक हीरालाल भी थे | जिन्होंने उन सैनिकों के लिए अपना खून दिया |

ये तो थी इतिहास की बात 62 को गुजरे 54 साल बीत चुकें हैं | लेकिन अब हालात बदल चुके हैं | आज उनके पास राशनकार्ड तो है पर उसपे राशन नहीं मिलता है, पेंशन नहीं मिलती | इतनी तंगी आ गयी है के खाने के लिए 2 वक़्त की रोटी ही नसीब नही हो पाती, रोटियों के लाले पड़ गये हैं हालात एक भिखारी से कम नहीं है | ऐसे में बस यही एक उम्मीद थी उनकी जिसे लेकर वो यहाँ आये और यहाँ आने के बाद जहाँ उनकी सबसे बड़ी उम्मीद टूट कर चकना-चूर हो गयी | गृह मंत्री श्री राजनाथ सिंह जी.. के दरवाजे पर तो यहाँ सेंकडो बहाने बना दिए जाते | कभी की जाओ पहले एप्लीकेशन डालो, या जाओ पहले अपॉइंटमेंट लेकर आओ, कभी उनके गेट पर कई कहने वाले लोग कह देते हैं की जाओ mygov.in website  पर एक आईडी बनाकर लॉग इन करो और तब उन्हें एक एप्लीकेशन लिखो | तो कभी उन्हें यूँ ही टरका दिया जाता के यहाँ कोई नहीं है चले जाओ यहाँ से ये कह कर उन्हें साफ इंकार कर दिया जाता रहा है | अब तो आप ये सब कुछ साफ-साफ देख सकते हैं की यहाँ लोगों की मदत के नाम पर स्टाफ की क्या हरकतें हैं | उन्हें मिलने तक का भी अवसर नहीं दिया जा रहा है तो काम तो बहुत दूर की बात है |

नीतीश कुमार-रामविलास पासवान से भी मिलने की कोशिश कर चुके हैं हीरालाल :

हीरालाल कहते हैं वो बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार से कई दफ़ा मिले पर कोई करवाई नहीं हुई | जब रामविलास पासवान से मिलने की कोशिश की तो समय नहीं रहने की वजह बता कर टाल दिया |

 

अब तो बस गृह मंत्री श्री राजनाथ सिंह जी से ही ये निवेदन और उम्मीद है की वे अपनी दृष्टी एक गरीब बुजुर्ग हीरलाल की तरफ भी घुमाएँ और उनकी सहायता करने की कृपा करें |

 

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