KFC वाले हरर्लैंड सैंडर्स चचा की कहानी ‘नेवर गिवअप’

KFC या केंटकी फ्राइड चिकन – एक नाम जो शायद आज किसी परिचय का मोहताज नहीं. बात चाहे दोस्तों के साथ फेवरेट हैंगआउट की हो या फिर चिकन के उम्दा स्वाद की, निश्चित रूप से आज KFC हम सब युवाओं के बीच बेहद पॉपुलर हो गया हैं. मगर क्या आपको पता हैं की दुनिया में फ्राइड चिकन के ब्रांड को बेहद सफल बना चुकी KFC कभी एक सड़क किनारे शुरू हुई थी. आज लगभग 18 अरब डॉलर का ब्रांड बन चुकी KFC के ब्रांड-आउटलेट आपको पुरे दुनिया में आसानी से दिख जाएंगें. अकेले भारत में ही KFC के कुल 335 आउटलेट हैं जो भविष्य में और भी ज्यादा बढ़ने की संभावनाए है. भले ही हरर्लैंड सैंडर्स की सोच से उपजा ये ब्रांड आज सफलता के सारे रिकॉर्ड तोड़ते हुए दुनिया भर के लोगो को अपने टेस्ट एवं वैरायटी से मन मोह रहा हैं परन्तु सफलता के चरम तक पहुचा यह नाम आज ब्रांड बन पाया है तो इसके पीछे एक जुनूनी आदमी की सनक को नहीं नाकारा जा सकता. आइये जानते हैं की कैसे सड़क किनारे शुरू हुए एक छोटे से स्टाल ने आज पूरी दुनिया को अपने स्वाद के अधीन कर लिया.

शुरुआती संघर्ष:

सूत्रों की माने तो संस्थापक हरर्लैंड सैंडर्स का चिकन के प्रति लगाव बचपन से ही था. कई काम करने के बाद सैंडर्स ने अपने रोजी-रोटी के लिए एक सर्विस स्टेशन खोलने की सोची. आस- पास कोई रेस्तरा नहीं होने के वजह से उन्हें वहाँ आने वाले लोगो को खाना भी खिलाना पड़ता था जिससे वे दो पैसे और मुनाफा कमा लेते थे. धीरे-धीरे वहाँ सर्व की जाने वाली चिकन को लोगो का बेतहासा प्यार मिलने लगा एवं रेस्तरा चल निकला. अपने चिकन के साथ अजीबो- गरीब प्रयोग करने वाले सैंडर्स ने आखिरकार 9 सालो बाद 11 मसालों को मिलकर एक ऐसा मिश्रण बना लिया जो आने वाले दिनों में लोगो को दीवाना करने वाला था. परन्तु कहते हैं न कि जीवन का असली रंग संघर्ष में ही निखरता हैं, सब कुछ ठीक चलने के बावजूद एक दिन सैंडर्स का रेस्तरा बंद हो गया एवं 62 वर्ष की उम्र में एक बार फिर वे बेरोजगार हो गए.

अपने संघर्ष से चिकन को ब्रांड बनाया:

62 साल के उम्र में भी हाथ पर हाथ धर के बैठे रहने के बजाय उन्होंने खुद पर एवं बनाये गए मसाले पर भरोसा दिखाया एवं एक पुरानी कार एवं कुकर लेकर निकल पड़े अपनी रेसिपी बेचने. अपना पहला आर्डर लेने के लिए उन्होंने लगभग 1000 रेस्तरा के चक्कर लगाये तब जाकर कही उन्हें अपना पहला आर्डर मिला. उसके बाद फिर कभी उन्होंने मुड़कर नहीं देखा. अमेरिका और कनाडा में घूम-घूम कर ही उन्होंने लगभग 600 फ्रेंचाइजी बाँट दिए. एक ऐसी कंपनी जिसका कोई दफ्तर एवं कोई आउटलेट न हो उसके लिए ये कामयाबी एक बहुत बड़ी बात थी. हलाकि 1964 में सैंडर्स ने अपने ब्रांड को एक अमेरिकी कंपनी को लगभग 20 लाख डॉलर में बेच दिया मगर उससे पहले KFC एक बहुत बड़ी ब्रांड बन चुकी थी.

कैसे पड़ा नाम:

कहा जाता हैं की हरर्लैंड सैंडर्स द्वारा बनाया गया फ्राइड चिकन केंटकी के गवर्नर को इतना पसंद आया की उन्होंने सैंडर्स को कर्नल की उपाधि तक दे डाली. यही से शुरुवात हुयी केंटकी फ्राइड चिकन की. मगर 1991 में पुरी दुनिया में बेहतर स्वास्थ्य के लिए तली चीजो के खिलाफ चले अभियान के बाद केंटकी फ्राइड चिकन का नाम बदल कर KFC कर दिया गया. नाम छोटा होने के वजह से अब कंपनी इस नाम के साथ दूसरे प्रोडक्ट भी बेच सकती थी. कंपनी ने विभिन्न देशो की आबादी को टारगेट कर कुछ खास वेज आइटम एंड स्नेक्स की भी शुरुआत कर दी जिन्हें लोगो ने खूब पसंद किया और देखते देखते आज ये कंपनी एक ब्रांड बन गयी. नवंबर 2006 में कंपनी एक नए लोगो के साथ बाज़ार में आई जिसमे कर्नल का सफ़ेद कपड़े में फोटो लगाया गया. भले ही सैंडर्स ने कंपनी बेच दी हो परन्तु उनके संघर्ष एवं उनके स्वाद को कोई भी नहीं भुल सकता. सूत्रों की माने तो आज भी उनके द्वारा 11 मसालो से बनाया गया मिश्रण एक टॉप सीक्रेट के तरह तिजोरी में बंद हैं एवं पुरे दुनिया में बस कुछ गिने- चुने लोगो को ही इसकी जानकारी हैं.

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हरलेंद सैंडर्स जिसने फास्टफूड चैन को एक नया आयाम दिया
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