अमित कुमार दास: 250 रुपए से 500 करोड़ के कंपनी के मालिक का सफ़र

Story of Amit Kumar Das : आपने बहुत सी हिंदी फिल्मे देखी होगी, हीरो काफी गरीब होता है, खेतों में काम करता है फिर शहर जाकर अपनी मेहनत और मजदूरी से बहुत बड़ा आदमी बन जाता है |

जी हाँ आज हमारी टीम आपको ऐसे शख्सियत के बारे में बताने जा रही है जिनकी कहानी किसी फिल्म से कम नहीं है | भारत के सबसे पिछड़े राज्यों में से एक बिहार में स्थित अररिया जिले के फारबिसगंज कस्बे में मिर्दुअल गाँव के एक किसान के घर में जन्मे अमित कुमार दास (Amit Kumar Das) के परिवार में भी लड़के आम किसान परिवारों की तरह बड़े होकर खेती-गिरस्ती में हाथ बंटाया करते थे। परन्तु अमित का मन बड़े होकर एक सफल इंजिनियर बनने का था परन्तु परिवार की माली स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी जो अमित की हसरते पूरी हो सके |

अपनी शुरुआती पढाई गाँव के स्कूल से करने के बाद बिहार के सहरसा स्थित  District Saharsa High School से 10वी की परीक्षा पास की | उसके बाद अपने पेरेंट्स को भरोसे में लेकर पटना के  A.N.College से साइंस में इंटरमीडिएट किया।

इंटरमीडिएट की पढाई करने के बाद Amit Kumar Das ने कुछ इंजीनियरिंग कॉलेज के इम्तिहान दिए लेकिन सफलता उनसे कोसों दूर थी | इंजीनियरिंग एग्जाम में सफलता ना पाते देख उनके दिमाग में मछली पालन से लेकर फसल का उत्पादन दोगुना करने के लिए ट्रैक्टर खरीदने जैसे ख्याल आने लगे जो की स्वाभाविक थे क्यूंकि अमित कुमार जिस क्षेत्र से संबंध रखते हैं वहाँ इन चीजों में आपार संभावनाए थी। लेकिन जब उन्होंने इसके बारे में पता किया तो उन्हें लगा कि इसके लिए काफी पैसों की जरूरत होगी, तो उन्हें अपना सपना धुंधलाता हुआ सा नजर आने लगा।

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परिवार की स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी की कोई इनके सपनों के बारे में सोचें, तो अमित ने खुद को उस स्थिती से दूर किया। अमित के गाँव के ही एक आदमी दिल्ली में रोजगार करते थे उनसे अमित की बात हुई और सिर्फ 250 रुपए लेकर वे दिल्ली की ओर रवाना हो गए। इंजिनियर बनने का सपना लिए दिल्ली पहुचे अमित को जल्द ही अहसास हो गया कि वह इंजीनियरिंग की डिग्री का खर्च नहीं उठा पायेंगे। शुरुआती दिनों में अमित अपने ही गाँव के उस व्यक्ति के साथ पूर्वी दिल्ली के लक्ष्मी नगर इलाके में रहने लगे और अपने खर्च निकलने के लिए पार्टटाइम ट्यूशंस लेने लगे। साथ ही, उन्हें दिल्ली विश्वविद्यालय से बीए की पढ़ाई शुरू कर दी। पढ़ाई के दौरान अमित को महसूस हुआ कि उन्हें कंप्यूटर सीखना चाहिए।

अमित कुमार अपनी पत्नी से साथ
अमित कुमार अपनी पत्नी से साथ

इसी मकसद के साथ वे दिल्ली के एक प्राइवेट कंप्यूटर ट्रेनिंग सेंटर NIIT पहुंचे। सेंटर की रिसेप्शनिस्ट ने जब अमित से अंग्रेजी में सवाल किए, तो वह जवाब में कुछ नहीं बोल पाए, क्योंकि अमित की अंग्रेजी उस वक्त बहुत ही कमजोर थी। रिसेप्शनिस्ट ने उन्हें समझाया कि उन्हें कंप्यूटर पढने में बहुत परेशानी होगी | उदास मन से लौट रहे अमित के चेहरे पर निराशा देख कर बस में बैठे एक सहयात्री ने उनकी उदासी का कारण पूछा। वजह जानने के बाद उसने अमित को इंगलिश स्पीकिंग कोर्स करने का सुझाव दिया। अमित को यह सुझाव अच्छा लगा और बिना किसी देरी के एक प्राइवेट इंग्लिश कोचिंग ज्वॉइन कर लिया।

अमित कुमार अपने परिवार के साथ
अमित कुमार अपने परिवार के साथ

कोर्स कम्पलीट करने के बाद अमित में एक नया Confidence जाग चुका था। उसी आत्मविश्वास के साथ Amit Kumar Das फिर से कंप्यूटर ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट पहुंचे और प्रवेश पाने में सफल हो गए। अब अमित को दिशा मिल गई थी। छह महीने के कंप्यूटर कोर्स में उन्होंने टॉप किया। अमित की इस उपलब्धि को देखते  हुए इंस्टीट्यूट ने उन्हें तीन वर्ष का प्रोग्राम ऑफर किया। प्रोग्राम पूरा होने पर “NIIT Lakshmi Nagar” ने उन्हें फैकल्टी के तौर पर नियुक्त कर लिया। अमित को पहली सैलरी के रूप में 500 रूपए मिले।

कुछ ही वक्त काम करने के बाद अमित को इंस्टीट्यूट से एक प्रोजेक्ट के लिए लन्दन जाने का ऑफर मिला, लेकिन अमित ने जाने से इनकार कर दिया। तब तक अमित अपनी कंपनी की नीव रखने का मन बना चुके थे | उस वक्त अमित की उम्र सिर्फ 21 वर्ष थी। अपने खुद की कंपनी को Established  करने की इच्छा रखने वाले अमित ने जॉब छोडऩे का फैसला लिया। कुछ हजार रुपए की बचत से पूर्वी दिल्ली के गणेश नगर में किराए पर एक छोटी सी जगह में अपनी सॉफ्टवेयर कंपनी आइसॉफ्ट (Ishoft) की शुरुआत की। 2001 में इस शुरूआत से अमित काफी उत्साहित थे, लेकिन मुश्किलें खत्म नहीं हुई थी।

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कई दिनों तक उन्हें एक भी प्रोजेक्ट नहीं मिला | गुजारे के लिए अमित ने जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में रात में 8 बजे तक पढ़ाते और फिर रात भर बैठ कर सॉफ्टवेयर बनाते। धीरे-धीरे समय बदला और अमित की कंपनी को प्रोजेक्ट मिलने लगे। अपने पहले प्रोजेक्ट के लिए उन्हें 5,000/- रूपए मिले। अमित अपने संघर्ष के बारे में बताते हैं कि उस वक्त लैपटॉप खरीदने के भी पैसे नहीं थे, इसलिए क्लाइंट्स को अपने सॉफ्टवेयर दिखाने के लिए वे पब्लिक बसों में अपना सीपीयू साथ ले जाया करते थे। इसी दौरान उन्होंने माइक्रोसॉफ्ट का प्रोफेशनल एग्जाम पास किया और इआरसिस नामक सॉफ्टवेयर डेवलप किया और उसे पेटेंट भी करवाया।

अब अमित कुमार दास के सपनों को उड़ान मिल चुकी थी। 2006 में उन्हें सिडनी (ऑस्टेलिया) में एक सॉफ्टवेयर फेयर में जाने का मौका मिला। इस अवसर ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय लेवल पर खुद को साबित करने का मौका दिया। इससे प्रेरित होकर उन्होंने अपनी कंपनी को सिडनी ले जाने का फैसला कर लिया। आइसॉफ्ट सॉफ्टवेयर टेकनोलॉजी (I Soft) ने कदम दर कदम आगे बढ़ते हुए तरक्की की। आज उसने ऐेसे मुकाम को छू लिया, जहां वह हजारों कर्मचारियों और दुनिया भर में करीब सैकड़ों क्लाइंट्स के साथ कारोबार कर रही है। इतना ही नहीं 200 करोड़ रुपए से ज्यादा के सालाना टर्नओवर की इस कंपनी के ऑफिस सिडनी के अलावा, दुबई, दिल्ली और पटना में भी स्थित है।

amit kumar das mbit
MBIT के चेयरमैन अमित कुमार दास तथा Macquarie University के Voice Chanceller MOU sign करते

वर्ष 2009 में पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने कुछ ऐसा करने का सोचा, जिस पर हर पिता को गर्व हो। कही न  कही अमित को अपने शुरुआती दौर के शिक्षा से कष्ट था। बस इसी एहसास ने उन्हें बिहार के फारबिसगंज में एक कॉलेज खोलने की प्ररणा दी। अमित ने काफी जदोजेहद से तत्कालीन मुख्यमंत्री नितीश कुमार से मिले सहायता से 2010 में यहां कॉलेज स्थापित किया और उसका नाम अपने पिता मोती लाल दास के नाम पर रखा – मोती बाबू इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (Moti Babu Institute of Technology (MBIT))। उच्च शिक्षा प्राप्त करके कुछ बनने का सपना देखने वाले उत्तरी बिहार के युवाओं के लिए इससे अच्छा उपहार कोई और नहीं हो सकता था।

Amit Kumar Das महत्वाकांक्षी “Matrabhumi Project” के उंदर आने वाले कुछ अन्य प्रोजेक्ट :

  • सुपर स्पेशिलिटी हॉस्पिटल (बनके तैयार)
  • इंटरनेशनल पब्लिक स्कूल (International Public School ) – बनके तैयार

Amit Kumar Das के कुछ अचीवमेंट :

  • Youngest person to received “Bihar Asmita Samman Award” at the age of 31 Years
  • Became the Software Project Internet at the age of 19 years
  • Became Microsoft Certified Professional at the age of 20 Years
  • Established the Software Company at the age of 21 Years
  • Became Member of Australian Indian Business Council (AIBC) at the age of 30 Years
  • Became the Founder Secretary of Bihar Foundation Sydney Australia at the ages of 31 Years
  • Became the member of Australian Institute of Company Directors at the age of 34 Years
  • Laid the Foundation stone of International Engineering College Moti Babu Institute of Technology (MBIT) in Forbesganj in 2010
  • Became the youngest personal to established an International Engineering College
  • Got the title of “Dharti Putra” (Son of Soil) from Magazine Yugputra
  • Got Microsoft Certificate of Achievement – Business Solutions at the age of 27 Years
  • Successfully created and established more than three Corporate Companies in India and Outside India
  • Extensive exposure and expertise at International and global level
  • Established himself and his company strong foot hold in Australia and targeting other developed nation as growth strategy
  • Headed and completed over 100 Projects across the globe

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