देवव्रत से भीष्म पितामह बने एक महान योद्धा के बलिदान की कहानी

Bhism Pitamah Story in Hindi: बात तब की है जब राजा शांतनु के पुत्र देवव्रत(पितामह)  ख़ुशी-खुशी अपने परिवार के साथ रहा करते थे | एक दिन राजा शांतनु को शिकार करने का मन किया एवं कुछ सैनिको को ले वे निकल पड़े अपने राज्य शिकार करने | ऐसे में काफी दुर निकल जाने के बाद उनकी मुलाकात एक परम सुंदरी कन्या सत्यवती से हुई | उनकी रूप-लावण्य से आकर्षित हो राजा शांतनु मन ही मन उनसे शादी करने का विचार कर लेते हैं |

जब वे सत्यवती का हाथ मांगने उनके पिता के पास पहुँचते हैं तो उनके पिता ये कहकर उनका प्रस्ताव ठुकरा देते हैं कि हम क्षेत्रीय नहीं है एवं क्या सत्यवती के पुत्र को आप कभी अपना उत्तराधिकारी बना पाएंगे…? विषम परिस्थितियों में घिरे राजा शांतनु इस प्रस्ताव को ठुकराते हुए वापस अपने राज्य लौट जाते हैं |

बुझे दिल से राजपाट सँभालते अपने पिता को प्रेम विरह में तरपता देख देवव्रत ये ठान लेते हैं कि वे खुद जाकर सत्यवती को राजा शांतनु से विवाह हेतु मनाएंगे | परन्तु एक बार फिर सत्यवती के पिता देवव्रत को यही प्रस्ताव देते हैं कि यदि सत्यवती के संतान को राज्य का उत्तराधिकारी मान लिया जाये तभी ये विवाह संभव हो पायेगा |

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ऐसे में देवव्रत ये प्रतिज्ञा लेते हैं कि मैं आजीवन राज सिंहासन का लोभ नहीं रखूँगा और कभी भविष्य में मेरी संतान सत्ता के लिए लड़ मेरे प्रण को तोड़ न दे इस वजह से मैं आजीवन ब्रह्मचर्य रहने की ही प्रतिज्ञा लेता हूँ | अपने पिता के प्रेम को एक नयी मुकाम पहुँचाने हेतु राजा देवव्रत आजीवन ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा ले भीष्म पितामह बन जाते हैं | धन्य थे आप पितामाह जिसने पिता-पुत्र के प्यार एवं स्नेह को अपने बलिदान से एक नई ऊँचाई दी |

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) :   इस लेख में प्रकट कि गयी जानकारी लेखक द्वारा गहन अध्यन एवं रिसर्च के पश्चात दी गयी है. रीडर्स ध्यान दे कि कुछ तथ्य जुटाने हेतु महाग्रंथो के विभिन्न अध्यायो से मदद ली गयी है. ऐसे में रीडर्स से अनुरोध है कि वे लेख पढ़ते वक़्त किसी भी तरह से विचलित न हो. हमारा उद्देश्य किसी भी तरह से धार्मिक आस्था को आहत करना नहीं है..

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