पिंकी ओलिंपिक मैडल जीत सकती थी मगर

Why India Fails at Olympics in Hindi : 4 भाई बहनों में सबसे बड़ी पिंकी को बचपन से ही अपने जिम्मेदारियों का एहसास था | पापा रेलवे में फोर्थ ग्रेड (Fourth Grade) के स्टाफ थे | आर्थिक तंगियों के बीच उच्च शिक्षा के ख्वाब को पूरा करने के साथ-साथ परिवार के प्रति जिम्मेदारियों का भी पिंकी काफी अच्छी तरह से निर्वाह कर रही थी | संक्षेप (इन शोर्ट) में कहें तो हर परिवार के लिए पिंकी एक वरदान समान थी |

पिंकी को दो  चीज बेहद पसंद थी,पढना एवं दूसरा दौड़ना और दोनों ही चीजों में पिंकी का कोई मुकाबला नहीं था | कॉलोनी वाले उन्हें जब पी.टी उषा कहकर बुलाते तो पिंकी की खुशियों का कोई ठिकाना नहीं रहता | वो अपने इस हुनर को काफी निखारना चाहती थी ताकि भारत के लिए, अपने देश के लिए वो कुछ कर सके | खेल के जानकार उन्हें ये करो, ये मत करो जैसे सुझाव तो देते थे परन्तु संसाधनों एवं उचित मार्गदर्शन के अभाव में न जाने वो पिंकी कहा खो कर रह गयी | आज पिंकी 2 बच्चो की माँ है एवं अपने शादी शुदा जिंदगी में खुद को एक आदर्श बहूँ साबित करने के जद्दोजहद में ही उसका पूरा अस्तित्व टिका हुआ है..

आखिर कौन है ये पिंकी…?

आपने भी अपने आसपास ऐसे हजारो प्रतिभाओं (Talent) को वक़्त एवं हालात के आगे घुटने टेकते जरुर देखा होगा मगर कमबख्त रोजी रोटी की कमाई में हम इतना मशगुल हो जाते हैं कि उनके बारे में सोचने की फुर्सत किसके पास है | अभी हाल ही में एक इंटरनेशनल (International) सर्वे पढ़ रहा था जिसमे भारत के इकनोमिक (Economic) ग्रोथ एवं विकास में भारतीय युवाओं के योगदान के बारे में बताया गया था | जानकर काफी ख़ुशी हुई की भारत हर क्षेत्र में पहले से बेहतर करने की कोशिश कर रहा है | करे भी क्यूँ न, आखिर विकास इसी का तो नाम है. मगर जरा सोचिये सवा अरब के आबादी में बस दो ओलिंपिक मैडल (Olympic Medal)..आखिर क्यूँ..क्या कमी रह गयी थी हममे..? 

“Why India Fails at Olympics in Hindi” केजवाब ढूंढने के लिए ज्यादा दूर जाने की जरुरत नहीं | ऐसे समाज में जहाँ “ पढ़ेगा लिखेगा बनेगा नवाब, खेलेगा कूदेगा बनेगा ख़राब” जैसे कहावत प्रसिद्ध हो एवं जहाँ देश के सम्मान के लिए लड़ने वाले एथलीट्स से ज्यादा पैसे कमाने पर जोड़ दिया जाये ऐसे समाज से आखिर हम उम्मीद भी क्या कर सकते हैं | परन्तु हाँ सवाल यह उठता है कि जिस समाज को अपने एथलीट की फिकर ही नहीं उसी समाज को उनके हार अथवा जीत में इतनी रूचि क्यूँ होती है..? सिर्फ इसलिए क्योंकि वो हमारे सम्मान के लिए लड़ रहे हैं एवं उनकी हार से हमारी बेईज्ज़ती होती है..आखिर जिस पेड़ को लगाने में हमने कोई मेहनत ही नहीं की उसका फल खाने की अभिलाषा हमे क्यूँ हो जाती है..खैर जो भी हो वो कहते हैं न कि उम्मीद पर ही दुनिया टिकी है | जहाँ एक और हमने अपने भ्रष्ट शासन व्यवस्था के आगे घुटने टेकते युवाओं की भीड़ देखी है तो वही दूसरी ओर पुलेला गोपीचंद जैसे कुछ जुनूनी इन्सान आज भी हमें जीने की नयी वजह दे रहे है | आइये डालते है एक नजर जो हमने Why India Fails at Olympics in Hindi के इस आलेख में लिखें हैं :

Why India Fails at Olympics in Hindi Point to Point :

(1) समाज की मानसिकता: इसे आप जागरूकता में कमी कहें या फिर हमारे समाज की मानसिकता जहाँ लोगो के दिल में ये बात घर कर बैठी है की बिना पढ़े आपका कोई भविष्य नहीं एवं खेल कूद कर आप बस अपना टाइम ही वेस्ट (Waste) कर रहे हैं | ऐसे में घरवालों, समाज एवं अपने आप को समझाने से ज्यादा समाज की मानसिकता के साथ बह चलना ही एथलीट्स को ज्यादा  आसान लगने लगता है.उचित मार्गदर्शन एवं वक़्त के थपेड़ों के बीच किसी एथलीट (Athelete) द्वारा एक “नार्मल लाइफ” को चूस(Choose) करने का डिसिशन (Decision) निश्चित रूप से हमारे रिजल्ट को प्रभावित करता है |

(2) उचित संसाधनों(Resources) की कमी: कहने को तो इंडिया में टैलेंट (Talent) की कोई कमी नहीं परन्तु एक कहावत है कि हीरे की सच्ची कदर एक जौहरी को ही होती है | विज्ञान एवं तकनीक के बढ़ते प्रभाव के बीच आज जीत की तैयारी में संसाधनों का काफी अहम् योगदान होता है परन्तु एक सच ये भी है कि हम भारत में रहते है जहा हर कदम पर मंदिर, मस्जिद तो बन सकते है परन्तु एथलीट्स को ट्रेन करने हेतु उन्नत स्टेडियम के लिए हमें आज भी काफी संघर्ष करना पड़ता है|

(3) बुनियादी जरुरत है खेल: आखिर हमारा समाज यह कब समझेंगे कि जीवन में खेल कूद की भी उपयोगिता है | आज जहाँ एक और बच्चो को खेल कूद में प्रोत्साहित करने के लिए सरकार बचपन से ही स्कूल सिलेबस ( Syllabus) में स्पोर्ट्स एवं CCA (Co-Curricular Activities) की उपयोगिता को समझाने की कोशिश कर रही है तो वही दुसरे और हमारे ही समाज का दूसरा पहलु एक PT अथवा स्पोर्ट्स टीचर का मजाक उडाता है | जिस दिन दुसरे शिक्षक एक स्पोर्ट्स टीचर एवं उनके क्लास की वैल्यू करना सीख जायेंगे उस दिन हर घर से एक चैंपियन निकलेगा..

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Why India Fails at Olympics in Hindi :

(4) प्रोत्साहन की तो बात ही छोडिये: ऐसे कितनी बार हुआ है कि एक बेहतरीन युवा टैलेंट जो की आगे जाकर देश के लिए काफी कुछ कर सकता है उसे समाज ने एक बेहतर एवं अनुकूल माहौल दिया हो.? यकीन मानिये जिस दिन  एथलीट के संघर्ष एवं दर्द को  समाज एवं लोगो का प्रोत्साहन मिलने लगेगा उस दिन हर घर से एक “हीरे” को निकलने से कोई नहीं रोक पायेगा | आज एथलीट सब कुछ होने के बावजूद भी स्पांसरशिप (Sponsorship) एवं सामाजिक तिरिस्कार के वजह से अपना बेस्ट नहीं दे पा रहें हैं |

(5) प्रशासन का नकारात्मक रवैया: अपने खुद के कहानी में खुद को साबित करने में हम इतना बिजी हो जाते हैं कि हमे देश दुनिया की कोई खबर नहीं रहती और शायद इसीलिए हम देश को चलाने के लिए एक मजबूत सरकार चुनते हैं इस उम्मीद से की इनके हाथों में हमारी देश की बागडौर ठीक रहेगी | आज स्पोर्ट्स एवं उसके विकास के लिए भारत में ढेरों संस्थाए बनी हुई है जिनका मूल उद्देश्य देश के लिए उन्नत टैलेंट को ट्रेन करना है | SAI (Sports Authority of India) एवं IOC (Indian Olympic Committee) जैसे संस्थाओं के ऊपर आज काफी कुछ निर्भर करती है | मगर यहाँ सवाल ये उठता है कि क्या वे अपना काम ठीक से कर रहे हैं..?

(6) हार-जीत के अन्तर को समझने की जरुरत: खेल को खेल के तरह ही लेना सीखे, क्या सिर्फ इसलिए की किसी एथलीट को एक मौका मिला था देश के गौरव का परचम दुनिया में लहराने का परन्तु हार ने सारे किये कराये पर पानी फेर दिया और उन्ही वजह से हम उन्हें तिरस्कृत करते रहे| हमारा एक बेसिक फंडा है जीतने वाले हीरो एवं हारने वाले जीरो |क्या सिर्फ इसलिए की पदक की हमारी उम्मीद किसी विशिष्ट खिलाडी से पूरी न हो सकी तो हम ये मान ले की ये खिलाडी अब किसी काम का नहीं | मेरा यकीन मानिये जिस दिन इतिहास के पन्नो में खो चुके इन एथलीट्स के हाथों हम अपने युवा एथलीट्स के बागडोर की कमान सौप देंगे उस दिन हमारे समाज से ढेरों उन्नत एथलीट निकल कर आगे आ पाएंगे |

 

भारत देश हम सबका है एवं इसे हमे ही बनाना है | हम आप से एक आदर्श नागरिक होने के नाते यही अपील करेंगे कि आप भी देश के सम्मान के लिए लड़ रहे प्रतिभाओं को थोडा आदर एवं सम्मान दे | साथ ही बड़े कॉर्पोरेट हाउस से ये निवेदन है कि भविष्य में हमारे एथलीट के बेहतर भविष्य हेतु सरकार के साथ कदम से कदम मिला एक उज्जवल एवं स्वस्थ्य भारत के हमारे सपने को सुनिश्चित करें |

हमने यह आलेख इन्टरनेट पर खोजें जा रहे इस सवाल के संदर्भ में लिखा है कि “Why India Fails at Olympics in Hindi”

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस लेख में प्रकट किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख “Why India Fails at Olympics in Hindi” में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति ट्रेंडिंगऑवर उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार ट्रेंडिंगऑवर के नहीं हैं, तथा ट्रेंडिंगऑवर उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.

फोटो साभार:huffingtonpost

 

One thought on “पिंकी ओलिंपिक मैडल जीत सकती थी मगर

  • September 19, 2016 at 9:58 pm
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    sir bahut badhiya likha hain..

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