रेल मंत्री सुरेश प्रभु जी के नाम खुला पत्र

माननीय रेलमंत्री

श्री सुरेश प्रभु जी

साल 2014 में आई मोदी लहर में जनता ने सरकार से जिस विकास एवं सुधार की बाते सोची थी निश्चित रूप से आप उन सबके कर्णधार समझे जा सकते हैं | जब विशेषज्ञों ने आपके रेलमंत्री बनते ही विकास के कवायदे लगानी शुरू की थी उस वक्त आपको लेकर मेरी राय भिन्न थी | मेरी नजर में आप भी उन विगत मंत्रियों के तरह थे जो रेलवे के राजस्व को बढाने में तो सक्षम थे परन्तु आम जनता की इस बेहद आम सवारी को खास बनाना उनकी पहली प्राथिमिकता नहीं थी | परन्तु विगत कुछ वर्षो से विकास के पटरी संग सरपट दौड़ती रेल-व्यवस्था को देख मेरे दिमाग में आपके प्रति सम्मान बढ़ा है |

बात चाहे ट्विटर या किसी अन्य सोशल प्लेटफार्म द्वारा जनता से जुड़े उनकी शिकायत/सुझाव को सुनने की हो या फिर अभी हाल ही में महाराष्ट्र जल-संकट में पीड़ितो के मदद हेतु किये गए बचाव कार्य, हर मोड़ पर आपने अपनी प्रतिभा एवं विकास के प्रति अपनी वचनबद्धता से हम आम जनता के दिल में एक खास जगह बनायीं है | शायद इसलिए मैं अपने आपको अपनी बात आप तक पहुँचाने से रोक नहीं पाया |

रेल एवं रेलवे-स्टेशन के प्रति मेरा झुकाव बचपन से ही रहा है | एक लॉयल कस्टमर होने के नाते रेलवे में हो रहे सुधार कार्यों को मुझे काफी नजदीक से देखने का मौका मिला है | नित-दिन हो रहे सुधार कार्यों एवं विकास के सपनो को उज्जवल बनाती आपके प्रतिबद्धता को देख मेरा मन उस सुनहरे भविष्य की कल्पना कर लेता है जब रेलवे फिर से एक बार अपने गौरवशाली अतीत को दोहरा सके | परन्तु मुझे बहुत दुःख होता है यह कहते हुए की तमाम विकास एवं सुधार कार्यों के बीच आज भी एक चीज ऐसी है जो बिल्कुल नहीं बदली |

रेलवे प्लेटफार्म में अनाथ मासूम बच्चो को देखकर एक बार तो बहुत गुस्सा आता है उनपर मगर हालात के मारे इन बेसहारो को देख दिल से एक ही आवाज़ निकलती है : “भगवान् इनका भला करे” अक्सर लाखो की भीड़ को अपने मंजिल तक पहुँचाती रेलवे प्लेटफार्म हमारे जीवन का एक महत्वपूण अंग होता है परन्तु क्या आपने उन बदनसीबों  के बारे में सोचा है जिनकी मंजिल ही ये प्लेटफार्म बन जाती है | छोटी सी उम्र में या तो ये बच्चे यहाँ अनाथ छोड़ दिए जाते हैं या फिर घर से भागे ये बच्चे रेलवे स्टेशन को ही अपना आश्रय बना लेते हैं | शिक्षा जैसे मौलिक अधिकारों से दूर ये बच्चे जिंदगी की रेलगाड़ी संग भागते- भागते अपना पेट पालने हेतु या तो झाड़ू-पोंछा का काम करते हैं या तो फिर किसी गलत रास्ते को अपना कर अपने रोजी रोटी का निर्वाह करते हैं |

नशा करते बच्चे
नशा करते बच्चे

सुनहरे भविष्य की आशंकाए एवं अपनों द्वारा ठुकरा दिए जाने का दर्द भुलाने हेतु अक्सर ये बच्चे नशे का सहारा ले लेते हैं | कहते हैं कि बच्चा जब बड़ा हो जाये तो उनकी समझ ही उनका मार्गदर्शन करती है परन्तु नशे के छांव में सोया इनका बचपन कब जवान हो जाता है पता ही नहीं चलता | दिन-रात नशे के साये में डूबे रहने की वजह से जवान होने पर ये इतने कमजोर हो जाते हैं की इनके द्वारा कोई काम भी नहीं हो पाता और फिर एक दिन आता है जब जिंदगी के आखिरी दिनों में या तो आनन-फानन में इन्ही किसी सरकारी अस्पताल में मरने के लिए छोर दिया जाता है या फिर गुमनामी के अँधेरे में इनका क्रियाक्रम | मरणोपरांत इन बेसहारो को अंतिम-संस्कार तक नसीब नहीं हो पाता |

  • क्या हम हालात के मारे इन बच्चो को सरकारी खर्च अथवा किसी ट्रस्ट/स्वयंसेवी संस्था के मदद से शिक्षित कर इन्हें अपने पैरो पर खड़ा नहीं कर सकते…?
  • क्या हम नशे में दुबे इन बच्चो को किसी REHAB सेंटर में भेज इनके जीवन में एक नए सबेरे की शुरुवात नहीं कर सकते….?
  • क्या हम skill india प्रोग्राम के तहत छोटे-मोटे कार्य हेतु इनको कुशल एवं हुनरमंद बना रोजी रोटी के प्रति इनकी तलाश को ख़त्म नहीं कर सकते…?

और क्या हम एक बेहतर एवं शांतिपूर्ण भविष्य गढ़ने हेतु राह से भटके इन बच्चो को एक और मौका नहीं दे सकते…?

अगर वास्तव में ऐसा हो जाये तो यह मानवता की बहुत बड़ी जीत होगी | थोड़े से प्यार एवं सम्मान के भूखे ये बच्चे हमारे सुनहरे भविष्य का मूल आधार है और इन्हें इनका बचपन लौटाना ही हमारी पहली प्राथिमिकता होनी चाहिए | आशा करता हूँ आपको मेरा ये सुझाव तर्कसंगिक लगे एवं इन बच्चो के उज्जवल भविष्य हेतु किसी ठोस कदम की एक बड़ी वजह भी |

धन्यवाद

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस लेख में प्रकट किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति ट्रेंडिंगऑवर उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार ट्रेंडिंगऑवर के नहीं हैं, तथा ट्रेंडिंगऑवर उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

फ़ोटो साभार : Arise

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