साहित्य के पुरोधा मुंशी प्रेमचंद से जुडी 5 बातें

Facts about Munshi Premchand: शायद उस वक़्त में क्लास 6 में पढ़ रहा था जब मेरे हिंदी की किताब में मैंने “कफ़न” नामक एक कहानी पढ़ी थी | भारतीय ग्रामीण पृष्ठभूमि के दो किरदार घिसु एवं माधव की जीवनी का बखान करते उस कहानी ने मेरे कोमल मन में एक गहरी छाप छोड़ी थी और फिर उस दिन से शुरू हुई प्रेमचंद के साहित्य के प्रति मेरा प्यार आज शायद दीवानगी की हद तक जा चूका है |

गोदान, कफ़न, बूढी काकी, रंग भूमि, कर्मभूमि, नमक का दरोगा, सेवासदन जैसे साहित्य को पढ़ बड़े होने वाले हमारे आज की युवा पीढ़ी के बीच प्रेमचंद्र जी का क्या स्थान है ये शायद शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता | अपने कलम से समाज के आडम्बरों एवं रुढिवादिता पर एक जोरदार प्रहार करती कालजयी रचनाओं से प्रेमचंद जी के यथार्तवादी मानसिकता की झलक आपको साफ  दिख जाएगी |

31 जुलाई 1880 को बनारस के निकट लमही गाँव में एक साधारण डाकमुंशी के घर जन्म लेने वाले एक औसत कदकाठी वाले युवक के बारे में शायद लोगों ने ये कभी नहीं सोचा होगा कि ये नाम आगे चलकर हिंदी साहित्य का सबसे बड़ा सितारा बन जायेगा | समस्त ट्रेंडिंग ऑवर परिवार के लेखकों का प्रेरणास्रोत रहे मुंशी जी को आज उनके जन्म तिथि पर हमारे परिवार की तरफ से शत शत नमन…आईये जानते हैं उनसे जुड़े कुछ रोचक तथ्य (Facts about Munshi Premchand)..

1. मुंशी प्रेमचंद के बचपन का नाम धनपत राय था एवं शुरुवाती दिनों में वे अपने लेखन के लिए इसी नाम का इस्तेमाल करते थे परन्तु उस वक़्त उर्दू में प्रकाशित होने वाली ज़माना पत्रिका के सम्पादक और उनके अजीज दोस्‍त मुंशी दयानारायण निगम ने उन्हें साहित्य में धनपत राय की जगह प्रेमचंद नाम लिखने की सलाह दी और फिर वहीँ से शुरू हुआ मुंशी प्रेमचंद और साहित्य का सफ़र |

2. आधुनिक काल के साहित्य के सबसे बड़े सितारे को भी शुरुवात में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा था | जी हाँ…बात 1910 की है जब उनकी रचना सोजे-वतन (राष्ट्र का विलाप) के लिए तत्कालीन हमीरपुर के जिला कलेक्टर ने उन्हें तलब किया और उन पर जनता को भड़काने का आरोप लगा, सोजे-वतन की सभी प्रतियाँ जब्त कर नष्ट कर दी गईं। इतना ही नहीं कलेक्टर ने प्रेमचंद को हिदायत दी कि अब वे कुछ भी नहीं लिखेंगे, यदि लिखा तो जेल भेज दिया जाएगा। सोचिये अगर ऐसा हो जाता तो क्या होता…?

3. साहित्य से मुंशी जी का प्यार इतना गहरा था कि अपने अंतिम दिनों में भी वे साहित्य से ही जुड़े रहे | तबियत ख़राब रहने के बावजूद भी उनकी एक ही ख्वाहिश थी कि अपने अंतिम उपन्यास “मंगल सूत्र” को ख़तम करें परन्तु दुर्भाग्यवश ऐसा हो नहीं पाया | उनकी मृत्यु उपरांत उनके पुत्र अमृत ने उनके इस सपने को पूरा किया |

4. क्या आपको पता है कि साहित्य के इस महान पुजारी को कभी बॉलीवुड में भी काम करने का मौका मिल चूका था | जी हाँ…उन्होंने मोहन दयाराम भवनानी की अजंता सिनेटोन कंपनी में कहानी-लेखक की नौकरी भी की थी | 1934 में आयी फिल्म “मजदूर” के लिए उन्होंने कहानी भी लिखी परन्तु कुछ ही दिनों में वे वापस बनारस चले आये क्योंकि उन्हें मुंबई और उससे भी ज़्यादा वहाँ की फिल्मी दुनिया रास नहीं आयी।

5. यूँ तो प्रेमचंद जी ने अपने जीवन काल में सैंकड़ों कहानी एवं उपन्यास लिखे परन्तु उनके द्वारा लिखी गयी “गोदान” भारतीय ही नहीं बल्कि विश्व साहित्य के सबसे बड़े धरोहरों में से एक बनी हुई है | इस कहानी के माध्यम से उन्होंने एक आम भारतीय किसान को हीरो बना समाज के झूटे आडम्बरों के मुँह ऐसा तमाचा जड़ा कि पूरा साहित्य जगत झुक कर इस युगपुरुष का अभिवादन करने लगा |

 

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