दुनिया में कुछ भी ऐसा नहीं है जो आप ना कर सकें

भले ही ये लाइन आप कितनी भी बार सुन चुके हों लेकिन वास्तव में इसकी सच्चाई को कोई बदल नहीं सकता है। ये कोई ऐसी लाइन नहीं है जिसे आप ये कहकर नजरअंदाज करने की कोशिश करें की, ये तो किताबी बात है। यहाँ मैं आपको एक ऐसी लड़की की कहानी बताने जा रही हूँ जो सच में पहले इस लाइन में भरोसा नहीं करती थी लेकिन बाद में यही लाइन उसकी फेवरेट लाइन बन गई…

आप में से कई होंगे जो इंग्लिश सीखना चाहते होंगे लेकिन हर बार थोड़ी कोशिश करने के बाद हार जाते होंगे ये सोचकर की इंग्लिश सीखना या फिर बोलना आपके बस की बात नहीं है। लेकिन जिस लड़की की हम बात करने जा रहे हैं उसकी इंग्लिश आपसे भी ज्यादा खराब थी और उसके यूनिट टेस्ट में जीरो मार्क्स आया करते थे। टीचर से लेकर पेरेंट्स भी उसको डाटते थे। लेकिन एक दिन उसने अपने मन में ये तय किया की उसे अब ऐसे नहीं रहना है उसे भी बाकी बच्चों की तरह अच्छे मार्क्स लाने हैं और पढ़ाई शुरु कर दी।

पहली बार वो अपनी क्लास में फर्स्ट आई उसके बाद उसने ऐसे ही अपनी पढ़ाई जारी रखी और दसवीं और बारहवीं 72 प्रतिशत अंक पाये। जब उससे पूछा गया कि उसने ये कैसे किया तो जवाब था कि सबसे पहले उसने पढ़ाई में रुचि लेना शुरु किया यानी उसको पसंद करना शुरु किया। इसके बाद सीखना शुरु किया और इसके पीछे लगातार अभ्यास करना भी शामिल था। उसने ग्रामर को सीखने के लिये रफ रजिस्टर में खूब प्रैक्टिस की। और यही कारण था की उसके मार्क्स ऐसे सब्जेक्ट में भी अच्छे आये जिसे वो पसंद नहीं करती थी।

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इसके बाद अपना कालेज खत्म करने के बाद उसने जाँब शुरु की क्योंकि उसके घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। जॉब उसको ऐसे फिल्ड में मिली जिसकी उसको ज्यादा समझ नहीं थी। कभी-कभी उसके साथ वाले लोग उसका मजाक बना दिया करते थे लेकिन उसके पास नौकरी छोड़ने का आप्शन नहीं था क्योंकि परिवार की आय मे सहायता करनी थी। क्योंकि उसे पता था कि नौकरी छोड़ने से बात सिर्फ बिगड़ेगी, तो उसने उस नौकरी की सारी बारीकियाँ सीखना शुरु कर दिया। अब वो अपने साथ काम करने वाले लोगों से भी आगे निकल गई थी। कोई उसे ताना नहीं मारता था। उसकी सैलरी इनक्रीज हुई लेकिन उसके बाद उसने वो नौकरी छोड़ दी क्योंकि अब ये उसकी हार नहीं थी बल्कि जीत थी। जीत के बाद आप मैदान छोड़ सकते हैं लेकिन हार के डर से मैदान छोड़ना गलत है।

इसके बाद उसने अपने फिल्ड में नौकरी शुरु की लेकिन तब तक उस क्षेत्र में भी काफी बदलाव आ चुके थे और जिसको समझने में फिर से उसे नये सिरे से मेहनत करनी पड़ी। यहाँ उसको नौकरी तो मिल गई लेकिन हिंदी टाइपिंग नहीं आती थी। नौकरी को बचाने के लिये उसे 7 दिन का समय दिया गया ताकि वो टाइपिंग सीखे। इंग्लिश टाइपिंग अच्छे से जानने के बाद जब उसे दोबारा हिंदी टाइपिंग सीखना बहुत ही मुश्किल लगा। लेकिन उसने सीखने का मन बनाया हुआ था तो आखिरकार वो सीख गई।

इस कहानी का सार सिर्फ इतना है की अगर आप पुरे मन से चाहें की आपको कोई काम करना है तो आप उसे कर सकते हैं। ऐसा कुछ भी नहीं जो आप ना कर पाये।

 

 

Nandini Singh

नंदिनी सिंह ट्रेंडिंगऑवर में एडिटोरियल प्रड्यूसर हैं|

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